“ दिवा एक यथार्थ “ पुस्तक समीक्षा

पुस्तक समीक्षा - पुरुषोत्तम नवीन प्रकाशित - janbhav.com “ दिवा एक यथार्थ”
लेखक - गोलोक बिहारी राय
आकृति प्रकाशन
F-29,सादतपुर एक्सटेंशन
दिल्ली 110090
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9205151347, 8076699199 समाज के वंचित तबकों को उनका वाजिब हक दिलाने के लिए शुरू हुआ आंदोलन बाद में अपनी पटरी से उतर गया. जिन गरीब-गुरबों और निरीह लोगों के हित में बंदूक उठी थी, वह वर्ग-संघर्ष की दिशा भूल कर उन्हीं पर तन गई. फिर तो विचारधारा के संरक्षण के नाम पर इंसानियत के न्यूनतम तकाजे को भी तिलांजलि दे दी गई. राजशाही, सामंतवाद और पूंजीवाद के खिलाफ लड़ते-लड़ते माओवादी नवसामतंवाद और पूंजी के संरक्षक बन बैठे. ×××××××××××××××××××××××××××××××××××× परंपरावादी सोच वाले सिर्फ उच्च जातियों में ही नहीं हैं. यह सोच निम्न जातियों, दलितों में भी है. परंपरावादी सोच व्यक्तिगत लाभ का पक्षधर होती है. व्यक्तिगत पूंजी, व्यक्तिगत मुनाफे की समर्थक होती है.” ×××××××××××××××××××××××××××××××××××××× सपना से दिवा कहती है, “दीदी, हम औरत हैं. इस माओवाद को हमने गर्भ में धारण किया, जन्म दिया. पाला-पोसा, बड़ा किया. फिर भी, इसमें जन्म लेने वाले ही हमें शारीरिक क्षुधा के लिए यंत्र के रूप में प्रयोग करते हैं. हमें सिर्फ हाड़-मांस से बना यंत्र मानव मानते हैं…जब हम संगठन के लिए अपनी आवश्यकताओं का दमन कर सकते हैं तो संगठन अपनी सोच को व्यापक क्यों नहीं कर सकता।” http://janbhav.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%ae-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%ae/
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