अर्वाचीन कबीर “यात्री” जी - बाबा नागार्जुन

जयंती पर विशेष

बेखौफ विरोध के जनकवि बाबा नागार्जुन

स्वतंत्र भारत का जनगण मन अधिनायक भी स्व- तंत्र की प्राप्ति के साथ ही अपने को जनगण से सदा अलग ही रखा।फिर तो व्यथित क्षुब्ध यात्री बाबा नागार्जुन की वाणी फूट पड़ती है——

ख़ून-पसीना किया बाप ने एक, जुटाई फीस

आँख निकल आई पढ़-पढ़के, नम्बर पाए तीस

शिक्षा मंत्री ने सिनेट से कहा--"अजी शाबाश !

सोना हो जाता हराम यदि ज़्यादा होते पास"

फेल पुत्र का पिता दुखी है, सिर धुनती है माता

जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता

(1953 में रचित)

विप्लव का कवि “यात्री” जी - बैद्यनाथ मिश्र

आमतौर पर इतिहास में वैसे ही लेखकों व कलाकारों का ज्यादा नाम लिया जाता है जो सत्ता से तालमेल बिठा कर उनका जयकारे लगा कर चारणगीत गीत गाते हैं। सत्ता का विरोध कर अपने समाज के लोगों की आवाज बनने वालों की राह में तो बेशुमार कांटे बिछे होते हैं। बाबा नागार्जुन इस दूसरी श्रेणी में आते हैं। इसलिए उनकी डगर मुश्किलों से भरी थी।

ऊपर तस्वीर में दाढ़ीवाले जो शख्स हैं वो एक नजर में किसी को बहुत ही साधारण किस्म के अधपगले से इन्सान लग सकते हैं लेकिन इन साहब की बात ही निराली है। ये बाबा नागार्जुन हैं। ये अपने समय की आवाज को बेखौफ होकर बिना लाग लपेटे के कहने का साहस रखने वाले जनकवि थे।

 नागार्जुन मैथिली, हिन्दी और संस्कृत के अलावा पालि, प्राकृत, बांग्ला, सिंहली, तिब्बती सहित कई भाषाओं के जानकार थे।. नागार्जुन सही अर्थों में भारतीय मिट्टी से बने आधुनिकतम कवि हैं.

बाबा नागार्जुन ने जब लिखना शुरू किया था तब हिन्दी साहित्य में छायावाद उस चरमोत्कर्ष पर था, जहाँ से अचानक उसकी तेज ढलान शुरू हो गई थी। बाबा सभी राजनीतिक एवं साहित्यिक वादों के साक्षी रहे, कुछ से संबद्ध भी हुए, पर आबद्ध वह किसी से नहीं रहे. उनके राजनीतिक ‘विचलनों’ की खूब चर्चा भी हुई. पर कहने की जरूरत नहीं कि उनके ये तथाकथित ‘विचलन’ न सिर्फ जायज थे बल्कि जरूरी भी थे. वह जनता की व्यापक राजनीतिक आकांक्षा से जुड़े कवि थे, न कि मात्र राजनीतिक पार्टियों के संकीर्ण दायरे में आबद्ध सुविधाजीवी कामरेड।

  कबीर जैसे अपनी बात बिना लाग-लपेट के बेखौफ होकर कहते ठीक यही खासियत नागार्जुन में भी थी।

उनकी कई प्रसिद्ध कविताएँ जैसे कि ‘इंदुजी, इंदुजी क्या हुआ आपको‘, ‘आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी‘, ‘अब तो बंद करो हे देवी यह चुनाव का प्रहसन‘ और ‘तीन दिन, तीन रात‘ आदि इसका बेहतरीन प्रमाण हैं.

उनकी एक अत्यंत प्रसिद्ध कविता ‘अकाल और उसके बाद’ लोकप्रियता और कलात्मक सौंदर्य का उल्लेखनीय उदाहरण है।


कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास

कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास

कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त

कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त.

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद

धुआँ उठा आँगन के ऊपर कई दिनों के बाद

चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद

कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद


भाषा पर बाबा का गज़ब अधिकार है। देसी बोली के ठेठ शब्दों से लेकर संस्कृतनिष्ठ शास्त्रीय पदावली तक उनकी भाषा के अनेकों स्तर हैं। उन्होंने तो हिन्दी के अलावा मैथिली, बांग्ला और संस्कृत में अलग से बहुत लिखा है।


  1975 के ‘आपातकाल’ के प्रति नजरिया देखना महत्वपूर्ण होगा। बाबा नागार्जुन न सिर्फ तीखे तेवर वाली कविताएँ लिखकर, बल्कि स्वयं आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेकर और जेल की सज़ा भुगतकर आपातकाल का विरोध कर रहे थे।


इन्दु जी क्या हुआ आपको


क्या हुआ आपको?

क्या हुआ आपको?

सत्ता की मस्ती में

भूल गई बाप को?

इन्दु जी, इन्दु जी, क्या हुआ आपको?

बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!

क्या हुआ आपको?

क्या हुआ आपको?


आपकी चाल-ढाल देख- देख लोग हैं दंग

हकूमती नशे का वाह-वाह कैसा चढ़ा रंग

सच-सच बताओ भी

क्या हुआ आपको

यों भला भूल गईं बाप को!


छात्रों के लहू का चस्का लगा आपको

काले चिकने माल का मस्का लगा आपको

किसी ने टोका तो ठस्का लगा आपको

अन्ट-शन्ट बक रही जनून में

शासन का नशा घुला ख़ून में

फूल से भी हल्का

समझ लिया आपने हत्या के पाप को

इन्दु जी, क्या हुआ आपको

बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!


बचपन में गांधी के पास रहीं

तरुणाई में टैगोर के पास रहीं

अब क्यों उलट दिया 'संगत' की छाप को?

क्या हुआ आपको, क्या हुआ आपको

बेटे को याद रखा, भूल गई बाप को

इन्दु जी, इन्दु जी, इन्दु जी, इन्दु जी...


रानी महारानी आप

नवाबों की नानी आप

नफ़ाख़ोर सेठों की अपनी सगी माई आप

काले बाज़ार की कीचड़ आप, काई आप


सुन रहीं गिन रहीं

गिन रहीं सुन रहीं

सुन रहीं सुन रहीं

गिन रहीं गिन रहीं

हिटलर के घोड़े की एक-एक टाप को

एक-एक टाप को, एक-एक टाप को


सुन रहीं गिन रहीं

एक-एक टाप को

हिटलर के घोड़े की, हिटलर के घोड़े की

एक-एक टाप को...

छात्रों के ख़ून का नशा चढ़ा आपको

यही हुआ आपको

यही हुआ आपको

(१९७४ में रचित,'खिचड़ी विप्लव देखा हमने' नामक संग्रह से )

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आओ रानी


आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी,

यही हुई है राय जवाहरलाल की

रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की

यही हुई है राय जवाहरलाल की

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!


आओ शाही बैण्ड बजायें,

आओ बन्दनवार सजायें,

खुशियों में डूबे उतरायें,

आओ तुमको सैर करायें--

उटकमंड की, शिमला-नैनीताल की

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!


तुम मुस्कान लुटाती आओ,

तुम वरदान लुटाती जाओ,

आओ जी चाँदी के पथ पर,

आओ जी कंचन के रथ पर,

नज़र बिछी है, एक-एक दिक्पाल की

छ्टा दिखाओ गति की लय की ताल की

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !


सैनिक तुम्हें सलामी देंगे

लोग-बाग बलि-बलि जायेंगे

दॄग-दॄग में खुशियां छ्लकेंगी

ओसों में दूबें झलकेंगी

प्रणति मिलेगी नये राष्ट्र के भाल की

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!


बेबस-बेसुध, सूखे-रुखडे़,

हम ठहरे तिनकों के टुकडे़,

टहनी हो तुम भारी-भरकम डाल की

खोज खबर तो लो अपने भक्तों के खास महाल की!

लो कपूर की लपट

आरती लो सोने की थाल की

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!


भूखी भारत-माता के सूखे हाथों को चूम लो

प्रेसिडेन्ट की लंच-डिनर में स्वाद बदल लो, झूम लो

पद्म-भूषणों, भारत-रत्नों से उनके उद्गार लो

पार्लमेण्ट के प्रतिनिधियों से आदर लो, सत्कार लो

मिनिस्टरों से शेकहैण्ड लो, जनता से जयकार लो

दायें-बायें खडे हज़ारी आफ़िसरों से प्यार लो

धनकुबेर उत्सुक दिखेंगे, उनको ज़रा दुलार लो

होंठों को कम्पित कर लो, रह-रह के कनखी मार लो

बिजली की यह दीपमालिका फिर-फिर इसे निहार लो


यह तो नयी-नयी दिल्ली है, दिल में इसे उतार लो

एक बात कह दूँ मलका, थोडी-सी लाज उधार लो

बापू को मत छेडो, अपने पुरखों से उपहार लो

जय ब्रिटेन की जय हो इस कलिकाल की!

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की

यही हुई है राय जवाहरलाल की

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी

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आपातकाल के प्रतिवाद में......


ख़ूब तनी हो, ख़ूब अड़ी हो, ख़ूब लड़ी हो

प्रजातंत्र को कौन पूछता, तुम्हीं बड़ी हो


डर के मारे न्यायपालिका काँप गई है

वो बेचारी अगली गति-विधि भाँप गई है

देश बड़ा है, लोकतंत्र है सिक्का खोटा

तुम्हीं बड़ी हो, संविधान है तुम से छोटा


तुम से छोटा राष्ट्र हिन्द का, तुम्हीं बड़ी हो

खूब तनी हो,खूब अड़ी हो,खूब लड़ी हो


गांधी-नेहरू तुम से दोनों हुए उजागर

तुम्हें चाहते सारी दुनिया के नटनागर

रूस तुम्हें ताक़त देगा, अमरीका पैसा

तुम्हें पता है, किससे सौदा होगा कैसा


ब्रेझनेव के सिवा तुम्हारा नहीं सहारा

कौन सहेगा धौंस तुम्हारी, मान तुम्हारा

हल्दी. धनिया, मिर्च, प्याज सब तो लेती हो

याद करो औरों को तुम क्या-क्या देती हो


मौज, मज़ा, तिकड़म, खुदगर्जी, डाह, शरारत

बेईमानी, दगा, झूठ की चली तिजारत

मलका हो तुम ठगों-उचक्कों के गिरोह में

जिद्दी हो, बस, डूबी हो आकण्ठ मोह में


यह कमज़ोरी ही तुमको अब ले डूबेगी

आज नहीं तो कल सारी जनता ऊबेगी

लाभ-लोभ की पुतली हो, छलिया माई हो

मस्तानों की माँ हो, गुण्डों की धाई हो


सुदृढ़ प्रशासन का मतलब है प्रबल पिटाई

सुदृढ़ प्रशासन का मतलब है 'इन्द्रा' माई

बन्दूकें ही हुईं आज माध्यम शासन का

गोली ही पर्याय बन गई है राशन का


शिक्षा केन्द्र बनेंगे अब तो फौजी अड्डे

हुकुम चलाएँगे ताशों के तीन तिगड्डे

बेगम होगी, इर्द-गिर्द बस गूल्लू होंगे

मोर न होगा, हंस न होगा, उल्लू होंगे