एकान्त / आत्म-कल्याण

रौनक़ें सब की सब अपने अंदर ही हैं
अपने अंदर ही मेला लगाते रहो

ख़ुद से मिलने के मौक़े चुराते रहो
जश्न तनहाइयों का मनाते रहो

खुद की  यादों के जितने परिंदे मिलें
बारी-बारी से सबको बुलाते रहो

काम कोई भी ‘भोला’ नहीं है अगर
ख़ुद को कर लो ख़फ़ा,फिर मनाते रहो