एक गाँव का होना

उसे ख़्याल है 
सबकी आँखों का भाव-विभोर होना,
ढोल की थापों की गूँज 
उसके पैरों का ताल में उठना-बैठना
और थाम लेना कई धड़कनें,
जो याद है
उसके पैरों का थककर जवाब दे देना।
 
उसे स्मरण है 
इसलिए ख़ुशी, जो वो ओढ़े हुए था
और मिलने का अन्दाज़ 
क़ाबू किये हुये जज़्बात,
शाम का मिलना रात से 
और रात का जुदा होना सुबह से,
उसे याद है 
सावन के वो सारे अकेले दिन।
 
उसे याद है 
लौ का उजाला
और ठिठकना रौशनी का 
यूँ उसके चेहरे के ठीक सामने 
सम्भलना समय की सीख से 
और समाप्त हो जाना अंधेरे के सामने,
यों याद है 
बाती आगे निकालते हुये 
गरम तेल में हाथ जला लेना।
 
उसे याद  है 
शोर का शांत होना,
फिर याद है 
जलकर राख हो जाना
उसे याद है एक गाँव का 
गाँव - गंवई का होना 
एक यायावर होना।
 
~~~~ यायावर की आज की शाम