कुछ सत्य

हमारी पीड़ाओं के द्वार पुनरावर्त हैं..
हम फिर-फिर जाते हैं सम्बन्धों के समाधि-स्थल पर..
तभी आँख से कोई आँसू गिरता है और
हृदय बार - बार काँपता है.. सामने ...
शून्य ...............

सूखा पत्ता टहनी से लटका झूलता है,
टूटने और  छूटने के बीच

बूँद बादल से छूटती है,
और बिखर जाती है धरती पर

मिट्टी का अस्तित्व ही मेरा अस्तित्व है,
जहाँ मैं मिटकर भी नहीं मिटूंगा

जीवन-द्वार के पार,
जो किसी को नहीं दीखता
मेरी प्रतीक्षा में है....

अब यही सत्य है, जो आज का सत्य है।

जीवन मृत्यु है
और मृत्यु शाश्वत समर्पण..