कैनवास

ज़मीं से आस्माँ तक
रंगों के सतरंगी मेहराब पे चढ़
बादलों के उस पार
उसको जाना था,

कैनवास के सादे काग़ज़
पे जीवन उकेरता
उस सादा मिज़ाज शक्ल की
उसे तलाश था 
उसे बारिशों का इंतज़ार था

उसे बुनना था नज़्म रिमझिमी
उसे सिलना था चाक ज़िगर
वो ज़ख्मों का रफ़ूग़र था
उसे धागे की तलब थी

सब रंग धुल चुके थे
थमी हुई ज़िंदगी का हिस्सा था अब
कैनवास!
वक़्त गुज़रता गया
गर्द जमती रही

दुनिया के लिये
वो सफ़ेद कागज़ था जिसपे
कलम ने कुछ आड़ा तिरछा खींचा था
पर जो रोग लिया था उसने
उसका कोलाहल सिर्फ़ वो सुन सकता था 
गाढ़ा खूँ टपकता था गहरे ज़ख़्मों से

रंगों की तृष्णा में तपता कैनवास
गुलाबी रंगना चाहता था
पर
वो अब बादलों के पार कहीं रहा करता है

कैनवास
शोक मनाता है
रोता है
जो हाथ उसमें ज़िंदगी रंगना चाहते थे
वो मर चुके थे
अब
हमेशा के लिये...