घाव

वह हर नियति
सबाल छोडती गयी...
वह भटकाना चाहती थी कहीं...
राह अपने आप को 
नयी राह मोड़ती गयी।
 
अर्थ निकलते गये इरादों के
पिघलते घाव इतिहास के
हिम्मत थी सहने की
हर चाबुक पीठ झेलती गयी।