चोटिल प्रौढ़ाएँ

उन प्रौढ़ाओं ने
नवयौवनओं से
पल-पल शत्रुता निभायी।
घर के बाहर चबूतरे पर बैठ
रखती रही हिसाब
उनकी चाल-चलन
कमर की लचक
और निर्बाध भाव के
मृणमयी बहिरंग गात का ।


झुर्रियों से भरी
वृद्धापन को दस्तक देती
उन श्यामलाओं को
कभी न भाये
उन गौरांगियों के
नैन-नक़्श
तिरछी नज़रें व धीमी मुस्कान
झुकी नज़रों के साथ वो
शर्मीली ठहाके की हँसी।


मुखाकृति ज़हरीली बना
वे इन्हें, कभी
जादूगरनी कहती रहीं
तो कभी
पुरुषों को रिझानेवाला
‘छल’ मानती रहीं।


इन प्रौढ़ाओं ने
पूरी निष्ठा से , उन
आरूढ़-नित्ययौवनाओं से दुश्मनी निभायी
जो मुँह खोल ज़ोर से हँसती,
मन भर जीतीं।


ये उनके चरित्र पर वार
करने में भी न हिचकिचायी;
सिद्ध कर दिया इन्होंने
जात ही जात की परमशत्रु होती है
अनंत काल से ।


सोंचे
दो पीढ़ियों के द्वन्द में
चोटिल प्रौढ़ाएँ
प्रेम पाती औरतों की
दुश्मन ना होतीं
तो भला क्या होती ?