जनजातीय क्षेत्र अध्ययन, बस्तर (छत्तीसगढ़)

राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच (FANS)

जनजातीय क्षेत्र अध्ययन, बस्तर (छत्तीसगढ़)

जिला--बस्तर, नारायणपुर, बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकुमा

विषय: छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में जनजातीय लोगों के शिक्षा और स्वास्थ्य पर अध्ययन

बारह सदस्यीय अध्ययन दल ने बस्तर संभाग के पांच जिलों नारायणपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा और बस्तर में 20.9.2018 से 28.9.2018 तक जनजातीय क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य की वास्तविक स्थितियों और चुनौतियों पर अध्ययन किया। इन नौ दिनों में हमारी टीम ने ग्रामीणों, शिक्षकों, चिकित्सको, जनप्रतिनिधियों, प्रखंड और जिला स्तरीय अधिकारियों, सुरक्षा बलों से परिस्थितियों का जायजा लिया।


जनजातीय क्षेत्र अध्ययन, बस्तर (छत्तीसगढ़)

अध्ययन के दौरान अध्ययन दल के अवलोकन में निम्नाकित तथ्य जानकारी सामने आयी:

*~शिक्षा~*

शिक्षा के क्षेत्र में कक्षा का स्तर बढ़ने के साथ-साथ बच्चों का ड्रॉपआउट भी बढ़ा है, खासकर बालिकाओं ने ज्यादा स्कूल छोड़ा। दूसरी सबसे बड़ी दिक्कत है, क्षेत्र में पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण शिक्षकों की कमी। संसाधनों की कमी दल को हर जगह नजर आया। सफाई के बारे में जागरूकता की काफी कमी पाई गई। हालांकि पिछले कुछ सालों में पढ़ने की उम्र वाले बच्चों ने ज्यादा से ज्यादा स्कूल पहुंचना शुरू कर दिया है, जो अपने आप में एक बड़ी सफलता है। कुछ जगहों में यह देखा गया कि शिक्षकों और बच्चों ने सीमित संसाधनों में अभूतपूर्व बदलाव लाया है। आवासीय स्कूलों ने बच्चों की उपस्थिति को काफी बढ़ाया है। इसके अलावा बच्चों की मातृभाषा को समझकर उन्हें हिंदी में पढ़ाने में कठिनाई होती है। संचार में होने वाली रुकावटों की वजह से काफी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं।

*~स्वास्थ्य~*

स्वास्थ्य के क्षेत्र में लोगों का पारंपरिक उपचारों से आधुनिक मेडिकल साइंस में भरोसे का ग्राफ बढ़ा है। अस्पतालों में डॉक्टर्स और स्पेशलिस्ट की भारी कमी दिखी। स्त्री विशेषज्ञों की नियुक्ति न के बराबर थी। स्वास्थ्य सुविधाओं को सब तक पहुंचाने में संचार में अवरोध एक बड़ी समस्या पाई गई। पूरे बस्तर डिवीजन में पाई जाने वाली कॉमन बीमारियां, मलेरिया, चर्म रोग, टीबी, एनीमिया, कुपोषण हैं। इसके अलावा गुप्तांग रोग और अल्कोहल और तम्बाकू जनित बीमारियां पूरे क्षेत्र में आम हैं। ब्लड डोनेशन से जुड़ी गलतफहमियों की वजह से ब्लड बैंकों में खून की सप्लाई में दिक्कत आती है। स्किल्ड मितानिनों की कमी की वजह से सुदूर क्षेत्रों में उपजी स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने में काफी मुश्किलें आती हैं।

अध्ययन दल द्वारा किए गए शोध का जिलावार निष्कर्ष :


जनजातीय क्षेत्र अध्ययन, बस्तर (छत्तीसगढ़)

*~नारायणपुर~* (20.9.2018- 21.9.2018)

दल 5 गांवो में गया। बासिंग, मुरहापदर, छोटे डोंगर, ओरछा, गुदाड़ी। इन गांवों के स्वास्थ्य और शिक्षण केंद्रों का प्रत्यक्ष अध्ययन - निरीक्षण किया। यहां के जिलाधिकारी, पुलिस अक्षीक्षक से भी मुलाकात हुई। इस क्षेत्र में----

*~स्वास्थ्य की बड़ी दिक्कतें~*
ज्यादातर लोग और मुख्यतः महिलाएं एनीमिक हैं। आयरन की गोलियां बांटी जाती हैं, खान-पान में आयरन की कमी की वजह से दिक्कतें हैं। जिलाधिकारी के मुताबिक, ‘नारायणपुर में जिला मुख्यालय को छोड़कर केवल दो ही एमबीबीएस डॉक्टर तैनात हैं’। मुख्य सड़क से गांवों की दूरी जितनी बढ़ती है, स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता और सुविधाएं घटती जाती हैं।

*~सकारात्मक बातें~*
अस्पतालों में डिलीवरी की संख्या बढ़ी है। टीकाकरण की संख्या बढ़ी है। यहां पर परिवहन और संपर्क समुचित न होने के बावजूद स्थानीय स्वास्थ्यकर्ताओं की उपस्थिति ने स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच का दायरा बढ़ाया है।

*शिक्षा के बारे में दिक्कतें~*
सुदूर क्षेत्रों से बच्चों को स्कूल तक लाने में दिक्कतें आ रही है। अभिभावकों को शिक्षा का महत्व नहीं मालूम। ज्यादा माओवादी आतंकवाद से प्रभावित होने के कारण शिक्षकों में भय का माहौल, जिससे अंदरूनी क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया नहीं हो पा रही। अनुदेशक और अनुदेशिकाएं, जिनका काम पोर्टा केबिन स्कूल में बच्चों की देखभाल करना है, वे अध्यपाकों की कमी के कारण बिना किसी ट्रेनिंग के पढ़ा रहे हैं। प्रशिक्षण केंद्रों के पास इन्हें प्रशिक्षित करने का कोई प्लान नहीं है।

*~सकारात्मक बातें~*
इतनी अतिवादिता के बावजूद पोर्टा केबिन्स का कॉन्सेप्ट बेहतरीन है। ओरछा जैसे सुदूर इलाके में भी बच्चों का खेल की राज्य स्तरीय टीमों में खेलना एक सकारात्मक पहलू है। रामकृष्ण मिशन के स्कूलों में बच्चों की संख्या के साथ-साथ शिक्षा गुणवत्ता भी स्तरीय था।