जो किस्सा लिखना बाकी है.....

आज चाँद पूरा है,
फिर भी कुछ अधूरा है।
नजरों की ख्वाहिशें
सूखे पेड़ों में ढूंढती बसेरा है।

ये वक़्त की
आपाधापी है,
कुछ बीत गया
कुछ बाकी है,
जब समय मिला
तो लिख लेगें,
जो किस्सा लिखना
बाकी है.....।

सागर में जितनी तरंगें हैं,
मन की उतनी उमंगें हैं।
मौसम भी कितना सुहाना है,
सबके लबों पर तराना है।
हम भी गा लें मिल के तराने;
प्यारा समां है;
पुरवईया लेके चली मेरी नैया।

विचारों की दुनिया भी;
एकदम निराली है।
कुछ अनुभव कर्मों के;
और कुछ कल्पनाओं के;
तो आखिर क्यों न इनको;
कागज पर उतार लें,
जो पढ़ने के प्रतीक्षा में हैं
जरा उनसे बाँट लें ।