ठिठुरन

सूखे कुएं की,
गहरी प्यास को देखा।

गरजते घुमड़ते मेघों को,
बरसने के लिए,
तरसते देखा।

मैंने.. ख़्वाब में,
इक किताब के भीतर,
शून्यता का संसार देखा।

धूप तो खिली लेकिन...
सर्द हवाएं साथ रही
     ...और...
खिली खिली धूप 
अच्छी तो लगी लेकिन...
ठिठुरन इस पर भारी रही।

वो दर्द से, 
कराहती रातें।
कुछ यूं !
चुपचाप जली,
न धुँआ उठा,
न राख बची......।

शामें चुपचाप
चली आती हैं,
तन्हाइयों का 
झोला लेकर,
हम खो जाते हैं
यादों में निःशब्दों की,
बस आँखो से
अश्क़ बह जाते है....
अनकहे शब्दों से...
होंठ फड़फड़ा उठते हैं
चुपचाप.........