डाकिया

शहर कस्बे से
थोड़ी ही दूर
गाँव के बगीचे
खेतों की मेढ़, पगडंडियों पर
उछलती, कूदती और चहकती
पली बढ़ी सीमा......
ट्रिन-ट्रिन
साइकिल की घंटी सुन
घर से कई बार
अब भी बाहर निकल जाती है।
इस आस में
कि डाकिये की थैले में
आज तो
कोई चिट्ठी होगी
मेरे नाम की........।

बरसों बाद सही
ख़त में
नीले स्‍याही से लिखे
बिना संबोधन वाली
चार पंक्तियों के नीचे
एक नाम तो होगा
और ठीक उसके उपर
लिखा होगा ...”तुम्‍हारा” ।

"मैं मान लूँगी
जो मेरा था
वो अब भी मेरा ही है
और धुंधलाए से कुछ शब्‍दों को
चूम लूंगी ये सोचकर
कि मेरी याद में गिरे
आंसुओं का ही निशान है।"

"इंतजार में खड़ी
भूल जाती हूँ
कि अब इस गली में
कोई डाकिया नहीं आता।
मीलों दूर शहर में
जा बसने वाला
अब नहीं लिखता
कोई चिट्ठी मेरे नाम की...।"

(9 अक्टूबर 2019  को डाक दिवस पर लिखी कविता)