नव जीवन

समय  की , 
धूप  निकल  न  जाए
 
ये कहानी, मात्र
कहानी  रह  न  जाए
 
खामोशी  के ,
चादर  तले
वीन तो बजा दो।
 
चलो ,
मान  भी जाओ
गूंगे-बहिरे  की
अदायगी  छोड़ो
कुछ ,
कहो  तो  सही...!
 
सर्द रातें,
ये  ठंडी  हवाएं
एक  टुकड़ा नरम  धूप  का
फेको  तो  सही...!
 
सर्द  लग  रही  है  ?
कँपी-कँपी  छूट  रही  है  ?
 
तो,…
फिर साथ आओ
हम साथ साथ चलें।
अहसास की गर्मी 
फैलाएं....
सूरज को निकलने को
मजबूर करें।
सब कुछ कर सकते हैं
हम
अगर हम
साथ चलें।