नव-वसंत

धँस गया काँटा करौंदे का
जो अभी बस पाँव में

जो पक गए हैं फल
गूलर, बेर के भी, केर के ..
मद भरा महुआ टपकता
है हवा को टेर के ...।

ओ मंजरी महकी है बागों की
जो गमकती छाँव में...।

आम बौराए, झरी है
नीम मेरे गाँव में..
फूटता सेमल लिपटता
राह चलते पाँव में...।

पीले पड़े पीपल - पात
झड़कर, हरे फिर हो गए
सिन्दूरी पाकड़ के टूँसे
संवाद तन में छोड़ गए।


धँस गया काँटा करौंदे का जो अभी बस पाँव में ...गोलोक विहारी राय की सम-सामयिक कविता का आनन्द ले  - सर्चिंग आईज (राष्ट्रीय हिंदी दैनिक) खोजी पत्रकारिता में एक जन-अभियान  - https://searchingeyes.page/article/dhans-gaya-kaanta-karaunde-ka-jo-abhee-bas-paanv-mein-golok-vihaaree-raay-kee-sam-saamayik-kavita-ka/ZsiFmw.html