निश्छल मन

यह जो असलियत है
इसे डस्ट-बिन जानता है.
अपनी घृणा,
अपनी असफलता,
अपनी बेईमानी,
अपनी शेखी,
अपनी बुराइयाँ,
अपना 'नपुंसक' आक्रोश,
'ये सब'
डस्ट-बिन में फेंक कर
बाहर निकलता हूँ
वो जो बाहर 
मिलता हूँ न औरों से ?
नकली..'मैं' हूँ ,
असली आदमी तो
घर के डस्ट-बिन में है !
अपनी असलियत
'कूडेदान में फेंककर
ये जो 'नकली' बनकर
जब मिलते हैं न..
उस हँसते हुए,
निर्मल मन के,
निश्छल ‘नकली'
मनुष्य से मिलना
मुझे बहुत भाता है!!
क्योंकि
सब अशुद्धियाँ,
सब विकृतियाँ,
सब त्रुटियाँ
डस्टबिन में डाल कर
मेरे सामने
जो उजागर होता है
वह
स्पष्ट, स्वच्छ, सत्य
नवप्रकाश से आलोकित
"अरुण" होता है