पान-गुटका महात्म्य

पान खाइए और देश चमकाइये..........

ययाति युग से लेकर एन डी ए युग तक अपनी अनादिकालिन संस्कृति के संरक्षण का प्रयास युगों युगों से होता रहा है। हमारी विविधता में एकता का प्रयोग मनीषी सतत करते आयें हैं।स्वतंत्रत भारत के प्रखर अर्थशास्त्री श्री गोरखनाथ सिंह ने भी इस दिशा में अथक लम्बा प्रयास किया । मनुष्य जन्म लेते ही कुछ विचित्र कार्य करता है जो उससके जीवन को एक आनंद के मार्ग पर प्रशस्त कर सके । इसी क्रम में उसके द्वारा इजाद की गयी एक उत्तम विधा है –पान चबाना, तम्बाक-गुटका चबाना...  !!

कहते हैं की हम दुनिया भर की तमाम सुस्वादु पकवान और हरी सब्जियां खा ले, तब भी इतना पोषण नहीं मिलता जितना पान चबाने से और अगर पान में गुटखा भी मिला हुआ हो तो बात ही निराली है... सिर्फ पान चबाना नहीं वरन उसे चबा के पिच्च से थूक देने का अलग ही मजा है ,वहीँ इसका पौराणिक महात्म्य भी है। यह नव स्फूर्ति प्रदायनी भी होता है। तभी तो किसी ने कहा है........

“पश्चिम दिशा से आयी तम्बकुआ, पूरब दिशा में छाई।

जहां देखे लठत तम्बाकू,बुढ़वा घुसकत-घुसकत जाई।।”

कहते हैं की प्राचीन काल में जब दुर्योधन युद्ध पे जाता था तो पहले पान खाता था और फिर थूक के ख़ुशी-ख़ुशी निकलता था.....कहते हैं तभी से ये प्रथा चली आ रही है ।

पान खा के थूकने से न सिर्फ आप हल्का महसूस करते हैं बल्कि जिस पथ पे आप चलते हैं वो भी रंगीन होता जाता है और अगर ये चित्रकारी नयी पुती पुताई दीवार पे की जाय तो क्या बात है जैसे “सोने पे सुहागा “..और उस दीवार की सूर्पनखा सी खूबसूरती देखते ही बनती है । पान के गुण यहीं तक सीमित नहीं हैं पर इसकी और भी कई विशेषताएँ हैं। मसलन –जब मूँह में पान-गुटका भरा रहता है तो किसी से बोलने की ज़हमत आपको उठानी नहीं पड़ती ,आपकी ऊर्जा भी बचती है और साइन लैंग्वेज में बात करने की आपकी प्रैक्टिस भी बन जाती है जो गूंगे बहरे लोगों से और अगर आप खुद भी हो गए तो बात करने में बहुत काम आती है ..ये तो वाही बात हुयी के “आम के आम गुठलियों के दाम “ ।

रामचरितमानस में तुलसीदास जी लिखते हैं “लंका में जब राक्षस पान खा के निकलते थे तो उनकी आभा देखने लायक होती थी और हर दीवार मानो चीख चीख के कहती थी मुझपे थूको.... मुझपे थूको “ ।

सिन्धु घाटी सभ्यता में भी कई जगह लाल मिटटी का पाया जाना इस बात को दर्शाता है कि वहां भी लोग पान खाया करते थे। समूहों में थूका करते थे । प्रख्यात इतिहासकार “नाथू लाल जी पनवाड़ी “ ने अपनी पुस्तक “इतिहास की बकवास “ में इस विषय का वर्णन करते हुए लिखा है कि “ लोग न सिर्फ पान के खाने के प्रेमी थे बल्कि पुराने समय में पान खा के थूकने की प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती थी” ।

अंग्रेजों के ज़माने में क्रांतिकारियों के लिए मिठाइयाँ बना कर देशभक्ति के लिए अपनी जवानी लगाने वाले “श्री छगन लाल हलवाई “ कहते हैं कि “आज भी जब मै आज कल के युवाओं का पान का सदुपयोग करते हुए देखता हूँ दिल खुसरोबाग हो जाता है । एक समय तो लगा की सदियों से चली आ रही ये प्रथा विलुप्त हो जायगी पर युवाओं में देश को गन्दा करने का जोश देखकर अच्छा लगता है “।

बात को आगे बढ़ाते हुए वो कहते हैं के किसी सार्वजनिक स्थान पर जब जाता हूँ और दीवारों का साफ़ सुथरा पाता हूँ तो मन में बहुत ग्लानी होती है, दिल पीड़ा से भर जाता है,अफ़सोस भी होता है कि युवाओं को ये दीवारें क्यूं नहीं दिखती ? खैर जितना हो सकता है सबको थूकने के लिए जगाता रहता हूँ और दीवारें दिखाता रहता हूँ कि यहाँ थूको वहां थूको ..नहीं तो खुद ही पान रखा रहता हूँ और खुद थूक देता हूँ “ !!

समाज में पान-गुटका-तम्बाकू के महत्ता उसके महात्म्य और होने वाले सदुपयोग को देखते हुए दो पंक्तियाँ सहज ही दिमाग में आती हैं --

“रहिमन गुटका चबाइए ,इकरे बिन सब सून “

थूक पड़े तो खिल उठे , हर दीवार का चून” !!