पूर्णाहुति

नदिया का घना-घना कूल है,
वंशी से बेधो मत ,
यह मन तो बिंधा हुआ फूल है

थिर है नदिया का जल जामुनी
याद नहीं आती क्या चांदनी।

जो आई जल भर ही आनने,
या नहीं की सुख के दिन माँगने,

करता वह बहुत बड़ी भूल है
नदिया का घना-घना कूल है।।

पाँच जोड़ बाँसुरी
बासन्ती रात के विह्वल पल आख़िरी
पर्वत के पार से बजाता कोई बाँसुरी
पाँच जोड़ बाँसुरी।।।

वंशी स्वर उमड़-घुमड़ रो रहा
मन उठ चलने को हो रहा
धीरज की गाँठ खुली, लेकिन
आधे अँचरा पर जो सो रहा।।।।