बंजारा भ्रमर

मैंने देखा
रात,
उसे
चाँद बन झील में उतरते

मैंने देखा
चार पहर बाद,
उसे
कुमुदिनी बन सरोवर में कुसुमित होते

मैंने देखा
सुबह,
उसे
नलिनी बन मन-पुष्करिणी में खिलते।

मैंने देखा
सांझ ,
उसे
भूख बन पेट में मरते।

मैंने देखा
पहर-दर-पहर
उसे
कुछ जुड़ते
कुछ घटते
इस दुनिया में बन बंजारे