बदलाव

वह लिखता था
क्रोध, तिलमिलाहट,
प्रचण्ड आक्रोश और असहमति के काग़ज़ पर
बारूद, बम, पिस्तौल और 
 ख़ून से....।
पर अब वह
देखने लगा है
 प्रकृति में सौंदर्य
उसकी भाषा में 
आ गए हैं
दया,स्नेह, प्रेम
और सहानुभूति
जैसे
शब्द ......,
अब वह,
जिसके साहचर्य में है ।
 
उसने एक दिन कहा था
दुःख के हाथ लंबे नहीं होते
अवसाद लँगड़ा होता है
और अनुराग का विस्तार 
आकाश से भी अधिक विस्तृत
होता है...,
और
उसी दिन उसे   हथेली में
आकाश मुस्कुराता दिखाई दिया था।
तब से सबको
वह बदला बदला
दिखता है, 
विनाश नही, विकास का
प्रतीक बन गया है।।