बालाकोट

साँझ से ही घरों का चिराग या तो जला ही नहीं या जलाकर बुझा दिए गए थे। चारों तरफ जंगलों से घिरा गाँव , जंगल में ही जहाँ तहाँ फैले घर। एक घना कूप अँधेरा। अघोषित ब्लैकआउट । संभावित युद्ध जैसे खतरे और इसका डर, हरेक व्यक्ति के साँसों में गहरे तक समाये हुए। कुल मिलाकर वर्षों से पूरा गाँव अँधेरे के ज़िन्दगी जी ने का अभयस्त।

यह बालाकोट के बगल के गाँव ही है। जहाँ परवेज़ अपनी मुफलिसी की ज़िंदगी का आज तोबा कर, एक नए जोश में आनंद की गठरी बाँध पगडंडियों पर गिरता पड़ता घर लौट रहा है। खेतों के मेढ़ के रास्ते सदियों से चले आ रहे हैं। विकास के नाम पर जहाँ बिजली नहीं दिखाई पड़ी। रोज़ की तरह आज भी देर हो चली थी।

 परवेज आज फिर लेट आया था । पीठ पर लदी बोरी कोने में फेंक ज़ेबा से पूछा - " शोएब सो गया क्या ? उसने खाना खाया ? ''

 ज़ेबा भड़क गई - " शर्म नाम की कोई चीज तुम्हें छू तक गई है क्या ? घर मे राशन तुम्हारे अब्बा  रख गए हैं जो उसे बना के खिलाती ? " 

" चिन्ता मत कर मेरी जान ! अब मुफलिसी के दिन गए "....कहकर परवेज ने कुर्ते की जेब से एक पॉलीथिन निकाल ज़ेबा को पकड़ा दिया ।

खोला तो उसमें रोटियां थीं ,ज़ेबा का चेहरा खिला - " काम मिल गया क्या ?" 

परवेज मुस्कुराया - "  बस तू अल्लाहताला से दुआ करती जा कि करम बनाये रखें ! "...अबकी बार उसने दूसरी पालीथीन पकड़ाई ।

ज़ेबा को लगा कि वो खुशी के मारे पागल हो जाएगी , उस पालीथिन में दो लाल - लाल टमाटर थे - " सच सच बताना शोएब के अब्बू तुम्हारी लॉटरी लगी है ना ? "

परवेज का मुस्कुराना जारी रहा , कोने में पड़ी बोरी उठाई ज़ेबा के सामने पलट दिया , वो चीखी - या अल्लाह ! इतना सारा लोहा कहाँ मिला तुम्हें ? " 

" समझ ले लॉटरी ही लगी है " 

" कुछ खुल के बताओगे ?"

परवेज सो रहे शोएब को जगाने की कोशिश करता हुआ बोला - " कब्रें खोदने का काम मिला है पगली ! मजदूरी के साथ - साथ हिंदुस्तानी फौज के गिराए गोले का लोहा भी ला सकते हैं "

ज़ेबा चटनी पीसते हुए बोली - " ये काम भी आखिर कुछ ही दिन का होगा ?....उसके बाद फिर वही हाल "

परवेज ने शोएब को गोद में उठा लिया था - " क्यों ? अल्लाह के करम से न तो हमारे मुल्क में कैम्पों की कमी है और न ही पड़ोसी मुल्क में गोला बारूद की ...अपनी तो समझो चल पड़ी है "

ज़ेबा चटनी पीस चुकी थी , उसके चेहरे पर इत्मिनान था