भीड़ की परछाईं

"किसी परछाईं ने
लगाया एक नारा
और फिर
आकाश, नदी, पेड़, बारिश,
मिट्टी, पक्षी, हवा, सभी में घुलने लगा ज़हर।
उछल पड़ी ईंटें और
फेंके गए पत्थर ...!”

पाँवों तले
बिछ गयीं सर्पीली सड़कें,
सड़कों पर
दौड़ने का भ्रम पाले
रेंगने लगी ज़िंदगी
गिरती-पड़ती चोटिल
होने लगी ज़िंदगी।

घायल ज़िंदगी ही नहीं
सड़कें भी हुई
बसें,कारें,मोटरगाड़ी
तो धूँ-धूँ कर जले
सदियों बाद किसी
बख़्तियार ख़िलजी ने
पुस्तकालय को भी
फिर से लूटा।

"डरे हुए मनुष्य के शरीर से
एक बास निकलती है
मानव ही नहीं
जिसे कुत्ते भी सूँघ कर
काटने नहीं, भागने लगे।”