भीड़ द्वारा की गई पिटाई और सर्वोच्च न्यायालय

हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय ने देश में बढ़ रहे भीड़तन्त्र पर लगाम लगाने के लिए एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण निर्णय दिया है और देश भर की राज्य सरकारों और केन्द्रीय सरकार के लिए कुछ दिशा निर्देश दिए हैं, जिनकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम ही रहेगी। लोकतन्त्र में दण्ड देने का अधिकार केवल न्यायालय को होता हैं। अन्य कोई भी हो, चाहे कितना भी बड़ा अधिकारी क्यों न हो, किसी को दण्डित नहीं कर सकता। कानून अपने हाथ में नहीं ले सकता।
 सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया है कि भीड़ द्वारा किसी की हत्या कर दिए जाने पर उसे मृत्यु दण्ड ही दिया जाएगा और इसका निर्णय भी छह महीने के अन्दर ही कर देना होगा। देश के हर जनपद में पुलिस अधीक्षक पद का एक नोडल अधिकारी और उपाधीक्षक पद का एक अधिकारी उसका सहायक होगा जो इन घटनाओं की रोकथाम के लिए आवश्यक कदम उठाएंगे। घटना हो जाने के बाद अपराधी को दण्ड दिलाना भी इनका ही दायित्व होगा।
 अब जरा इसके दूसरे पहलू पर भी विचार कर लिया जाए। क्या किसी अपराध को रोकने के लिए मृत्यु दण्ड का भय किसी काम का होता है। आपने कितने अपराधों के लिए मृत्यु दण्ड निश्चित किए हुए हैं, क्या वह अपराध होने बन्द होगए हैं? आप एक पूरा तन्त्र खड़ा करके कुछ लोगों के लिए नौकरी का तो प्रबन्ध कर सकते हैं लेकिन अपराध नहीं रोक सकते। अपराध रोकने के लिए तो नागरिकों के मन से आवाज आनी चाहिए कि यह गलत है।
 और सबसे पहले तो प्रश्न यही उठता है कि व्यक्ति कुछ गलत होता हुआ देखकर कानून अपने हाथ में लेता ही क्यों है? न्यायालय की शरण में क्यों नहीं जाता? पहला कारण न्याय का महँगा होना। दूसरा समय बहुत अधिक लगना और तीसरा वहां भी न्याय न मिलना। जनता जानती है कि यदि इस न्यायालय में उस वकील को खड़ा कर दिया तो जीत निश्चित है। क्यों और कैसे, यह पूछने का साहस कितनो में है?  इतना ही नहीं वरन न्याय मिलता भी है तो इसमें इतना विलम्ब हो जाता है कि उस न्याय के कोई मायने ही नहीं रह जाते।
 इन सब से हट कर यदि हम भीड़ तन्त्र के मामलों पर ही गौर करें तो आपके बच्चे को उठाने वाला या उठाकर मारने वाला असपके हत्थे चढ़ जाए तो आपकी ही पहली प्रतिक्रिया क्या होगी? क्या आप उस समय न्यायालय जाने के बारे में सोच भी पाएंगे? सिद्धान्त में आप चाहे जो बघारिए लेकिन वस्तु स्थिति यह है कि आप अपना गुस्सा तत्काल उतारना चाहेंगे।
  इसी प्रकार जिस गाय को आप माँ के स्थान पर बैठाते हैं, उसकी पूजा करते हैं, यदि आप देखें कि कोई उसे कष्ट दे रहा है, उसकी हत्या करने के लिए ले जा रहा है तो आपकी पहली प्रतिक्रिया उसे छुड़ाने की होगी। लेकिन दूसरा व्यक्ति आराम से नहीं छोड़ता तो आपका हाथ उठना स्वाभाविक ही है। तब भी आप किसी न्यायालय की शरण में जाने के बजाय स्वयं निबटना ही उचित समझेंगे। यदि आपने कहीं किसी पुलिस वाले को सूचना दे भी दी तो और चाहे जो कुछ भी क्यों न हो लेकिन उस गौमाता की जान नहीं बचेगी। बाकी हम सभी समझते ही हैं।
 कहने का तात्पर्य यह है कि अपराध होने के बाद दण्ड के बजाय उपाय ऐसे करने होंगे कि अपराध हो ही नहीं। अब जब सर्वोच्च न्यायालय अपना यह आदेश सुना रहा था तो झारखण्ड में आदिवासियों को भड़काने के ध्येय से भाषण दे रहे धुर वामपन्थी स्वामी अग्निवेश को वहां की भीड़ दौड़ा दौड़ा कर पीट रही थी। इस लोक तन्त्र में आपको कुछ भी कहने की स्वतन्त्रता है तो हमें भी तो कुछ भी करने की स्वतन्त्रता होनी ही चाहिए।
 नहीं, हमारा ध्येय न तो न्यायालय का विरोध या अपमान करना है और न हीं भीड़ तन्त्र को बढ़ावा देना। हम तो बस इतना कहने का प्रयास कर रहे हैं कि हमें ऐसे कदम उठाने चाहिए कि लोगों का न्यायालय में विश्वास बने। यदि <strong>*बच्चे उठाकर मारे या बेचे नहीं जाएंगे,किसी दूसरे की आस्था की निन्दा और टिप्पणी न की जाय गौमाता की हत्या नहीं की जाएगी और गोमांस खाने के प्रचलन बंद हो, पूर्णतया निषेध हो*</strong> तो भीड़ किसी पर क्यों अपना गुस्सा उतारेगी? आप गुस्सा दिला कर कहें कि न्यायालय में विश्वास रखो तो यह सम्भव नहीं है। परिवारों में शिक्षालयों में अधिकारों के साथ साथ कर्तव्य पालन की भी शिक्षा दीजिए और देखिए परिणाम।

 

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