मझधार

वक़्त का प्रवाह 
आँधी की तरह आगे बढ़ा
मैं भी ठिठक गया
क्यों कि
मैं वक़्त के साथ न था

 

खो गये हैं सब सपने
बह गए तूफानों में
इन डूबती सी आँखों को
कोई कश्ती भी उधार न दे
सीप से बिछुड़ कर
दरिया से जा घिरे
बिन बने मोती
लहरों से जा मिले
उन नैनों को जीने का
कोई तो आधार दे दे
मांझी मेरे हाथों में
अब तो पतवार दे दे।