महात्रासदी

लिख नहीं सकता
अब,
प्रकृति, सौन्दर्य, प्रेम, माधुर्य
विरह, विक्षोभ, वैराग्य
नहीं,
कुछ भी नहीं।
 
महज़ आँसू और गुहार
मानवता की हार
वसंत का हर श्वास
एक क्रूर अट्टहास
कुछ भी
लिख नहीं पाता।
 
लिखना ही नहीं चाहता
वे गोल गोल चाँद सी रोटियाँ
रेल पटरियों पर फैली
चीथड़ों-लोथड़ों के बीच।
 
क्षुधा पूर्ति की निराशा में
आपने गाँवों की बाट खोजती
चलते चलते सड़कों पर 
भूख और प्यास से दम तोड़ती 
अप्रवासी मज़दूरों की त्रासदी भरी जिंदगियाँ,
नहीं लिख पाता
नही लिख पाता