महुआ

मैं लिखूंगा,

हाँ मैं लिखूंगा,

पर उस दिन

जिस दिन,नया सूरज उगेगा

जिस दिन,सबको

अच्छा महसूस होगा..

 

जिस दिन,हर खिली

हुई कली से टपकी ओस की

बूंद तितली का परिधान बनेगी

जिस दिन,चाँद मेरा लिखा

मौन बांचेगा

उस दिन,अच्छा....

 

जिस दिन,महुआ चुएगा

उस दिन,लिखूंगा...!

 

पर,ये क्या ?

महुआ तो मेरे बाग़ में है  ही नहीं...!

पर होगा महुआ भी

होगा

सबको अच्छा भी लगेगा

और उस दिन मैं

लिखूंगा