मुक्तादल जल बरसो

बादल..
कभी यूँ भी,
बरसो..
मुक्तादल जल बरसो...
पावन सावन में,
मुक्तादल जल बरसो...

भींग जाएं सारी,
चिड़ियाँ तितलियां..
मैं भी देख सकूँ,
उनका शरमाना।

गीली कर दो मेड़ें..
सारे खेत उफना दो।
मैं भी ओढ़ सकूँ,
नर्म चादर,
उज्जवल जल धारा की।

भर जाएं..
ताल तलैया,
सारी नदिया ..
किनारों के सान्निध्य में,
मैं भी देख सकूँ...
पिघलता कोई ह्रदय,
उत्सुख दुख-दुख से,
हर्षित मन.....