रमज़ान मुबारक

शीराज़ क़ुरेशी व इमरान चौधरी सैयद फ़ैज़ अली खाँ की ओर देखते हुए, जो कि अपने कटोरे में बचे हुए टुकड़ों को निपटा रहे थे, लम्बी सांस भरते हुए,

इफ्तार....यादें ही शेष हैं..

क्या दिन थे, वल्लाह ! सोचता हूँ तो आंखों में आंसू दरिया ए दजला-फरात  की तरह बहने लगते हैं। पूरे एक महीने शाम का खाना बनता कहाँ था । पूरे रमज़ान में हर रोज़ इफ्तारी के लिए चापलूस लाला लोग, धोती वाले नेता, बड़े-बड़े अफसर, घर पर आकर इफ्तारी के लिए चिरौरी करते थे। अपने ऑफिस, घरों और विधानसभा तक मे इफ्तारी पर हमारा इस्तकबाल होता था। कुल 30 इफ्तारी और 300 नेताओं  की खुशामत। जिससे हाँ कर देते थे वो बेवकूफ .. चूम-चूम कर शुक्रिया में अपने गलीज़ थूक से हमारा हाथ गीला कर देते थे। तब कोरोना का युग न था। तब भी बाद में चूल्हे की राख से हाथ धोना पड़ता था। लिल्लाह...क्या ज़माने थे...

मुल्लायम जादो, आलू जादो, खुजली वाल तो अक्सर  मंदिर में इफ्तार कराते थे। मन्दिर की मूरतों पर कपड़ा डलवा देते थे। मन्दिर में नमाज़ पढ़ने का अपना ही मज़ा होता था। नमाज़ पढ़ी, वही इफ्तारी की। शानदार दावत हुई, मिठाई का डिब्बा थामा, घर की राह पकड़ी, बीबी जान को डिब्बा थमाया।

बच्चों की अम्मा बोली क्या ले आये, मुल्लाजी ! डिब्बा बच्चों की अम्मी को थमाकर... हम आंख मार के कहते,

होशियार खाते ..... , बेवकूफ  खिलाते हैं".....

लटकती टाट-चटाई के पीछे से अम्मा के ठहाके लगाने की आवाज़ें आज भी हमारे कानों में गूंजती हैं। अब्बा दूसरी जगह इफ्तारी में देसी घी की बिरयानी झोरने गए हुए होते थे।

.... मगर अब सब खत्म हो गया...उधर मोदी... इधर जोगी.... सब खत्म.... अब खुद के पैसों और साठ रु दर्जन वाले केलों और नमक से रोज़ा खोलना पड़ता है...।

मुँहझौंसा कब उतरोगे गद्दी से। कब पुराने दिन लौटेंगे । सारा रमज़ान का बजट ही बिगड़ गया, अपनी जेब से इफ्तारी की तो बच्चों को भी फ़िज़ूल खर्ची की आदत न पड़ जाएगी ।

कल लौकी, भतुआ और शीशकोहड़ा खाकर रात में सो गए। ख़्वाब में क्या देखते है कि... इफ्तारी में बेगम मुर्गे का 'एक फिट लम्बा' 'लेग-पीस' इसरार कर-कर के हमारे मुँह में घुसेड़े दे रही हैं। हम मना कर रहे हैं मगर वो मान नहीं रही हैं ।...

अकलेस जादौ, राउल गांदी, सिपाल सिंह जादौ... हमारे मुँह में काजू-पिस्ता आइसक्रीम की पूरी ब्रिक घुसेड़े दे रहे हैं..

मोटी आइसक्रीम की सिल्ली घुसेड़ने से हमारा मुँह चिर गया... मीठा-मीठा दर्द होने लगा.... दर्द से आंख खुल गई...देखते क्या हैं.... चारपाई के लकड़ी के पाये का ऊपर का गोल हिस्सा हमारे मुँह में धसा हुआ है... जिसे हम आइसक्रीम की सिल्ली समझ कर नींद में चबाने की कोशिश कर रहे थे। बड़ा वाला शहज़ादे अमीर अफ़ज़ाल बगल में सो रहे थे.... वो हमारे सिर के बाल पकड़ कर... हमें अपनी ओर खींचे तो... हमारा मुँह लकड़ी के पाये से आज़ाद हुआ.... मगर मुँह में काफी चोट आ गई और आगे के दो दांत लकड़ी के चारपाई के लकड़ी के पाये में धसे रह गए। दो दांतों की कुर्बानी हो गई सिपाल जादौ की आइसक्रीम के चक्कर मे....

खैर कोई बात नहीं, कभी तो मोदी-जोगी फ़ना होंगे। फिर से महफिले सजेंगी, फिर से इफ्तारी होगी, इसी उम्मीद में दिन गुजर रहे हैं।

“खुशामदीन.... रमज़ान मुबारक”