वह लौटा भी, लौटने जैसा नहीं

क्षत्रपों के राजनीतिक उदघोषणाओं से 
बिखर चुका
टूटे विश्वास लिए 
खण्डित आस्थाओं के साथ 
बेबस लाचार मज़दूर 
हज़ारों-हज़ार की संख्या में 
सभी दिशाओं से लौट रहे हैं, अपने-अपने घर।
 
वह नहीं जानता ....
उसका लौटना, लौटने जैसा न होगा।
 
उसे लौटना था और..
लौटना चाहा भी 
मनीआर्डर की तरह।
 
वह लौटने का सोच रहा था
लहलहाते सरसों के खेत में,
ठुमकते हुए पीले फूल की तरह।
 
उसे लौटना था ...
सूखे कुएँ में पानी की तरह।
 
वह जब भी सोचा लौटने के ...
खुद के कच्चे घर में, पक्की ईंट की तरह।
 
उसे लौटना था...
शादी-ब्याह के महीने में
मटकोर-हल्दी लगाई के मधुर गीत की तरह।
 
वह लौटने के लिए उमड़ रहा था
फैले आँगन में
चूल्हे की आँच पर पक रहे पकवान की तरह।
 
वह लौटने का सोच रहा था
क़र्ज़ की अदायगी की तरह।
 
उसे लौटना था..
पत्नी के खुरदरे पैरों में बिछुए की तरह।
 
वह लौटा भी, लौटने जैसा ही नहीं ...
महामारी के दुर्दिन में
रेल की पटरी पर सोलह समाधियों की तरह।