शब्दों की चाल

अन्तरिक्ष में नक्षत्रों की
चादर बिछ गयी
बादलों के बीच से
शशांक शरारत कर रहा है,
नींद का बिछोना बिछा
स्वप्न नेत्रों से
उलझने तैयार बैठे हैं, 
समय आ गया है कि
विद्युत-दीपों को बुझाया जाए,
नींद को बुलाया जाए
स्वप्नों को जगाया जाए !
जीवन की लय को शांत कर
कर्म निष्क्रिय हो गए हैं,
पर चेतना सुप्त नहीं है
क्योंकि शब्द स्वच्छंद हो
प्रष्ठों पर मृगों की भाँति
चौकड़ी भर रहे हैं !
विचारों के घर्षण से उत्पन्न
असीमित ऊर्जा,
शब्दों का रूप धर 
स्याह अंतरिक्ष में 
दामिनी सा गर्जन कर
कुछ कल्पनाओं को
जीवन देने की जुगत में है ।
शब्द यथार्थ से कह रहे हैं
कुछ देर के लिए 
तुम नेपथ्य में चले जाओ
कलम मंच संभाल लेती हूँ,
स्वप्नों की छाँव में 
मैं कुछ कपोल कल्पनाओं 
को उड़ान देती हूँ,
देखो कैसे ये 
स्याही में सिमटे 
शब्दों से सराबोर सफ़हे, 
स्याह को चुनौती देते है ।
रचना की बिसात पर
शब्दों की चाल
देखी है कभी?
ढाई घर चलते
अक्षरोंसे बनते
अलंकारों की शय 
को महसूस किया है ?
कैसे एक शब्द
सम्पूर्ण रचना का
अर्थ बदल देता है? 
विचारों की श्रंखला से 
होती, उस दिमागी 
मात को, भोगा है ?
तुम देखना 
अक्षरों से बनते शब्द 
शब्दों से बनते वाक्य
विचारों की धुरी पर 
कुछ ऐसे नर्तन करेंगे,
जैसे कालचक्र की धुरी 
पर सृजन घूमता है 
मृत्यु घुमती है,
जैसे इश-भजनों को
सुन भक्त झूमता है, 
पुनर्जीवन के सापेक्ष 
में स्रष्टि घुमती है,
क्यूंकि शब्दों में
सामर्थ्य होती है,
विचारों को जीवन
देने की,
जीवन में बदलाव
लाने की, 
जमाने में नयी लीक
धरने की,
नए युग की नींव
रखने की ।
21 December 2015