शिवलिंग

।।ॐ।। शिवालयों में स्थापित श्याम वर्ण का शिवलिंग मूलाधार का शिवलिंग है।सभी समझते हैं कि इस शिवलिंग में शिव विराजते हैं ।किंतु यह शिवलिंग शिव का लिंग नहीं है।वह आधा योनि है।शिवलिंग तो मंदिर के ऊपर प्रकट होता है, जो आग से प्रज्वलित त्रिशूल की भांति मंदिर में गिरता रहता है। अर्थात उसमें उल्टे मंदिर की आकृति की ऊर्जा संरचना निरंतर शिवलिंग पर गिरती रहती है।
शिव इसमें शीर्ष पर बिंदु रूप होते हैं।यह राजराजेश्वर शिव नहीं होते, यह सदाशिव होते हैं।सभी को शुन्य में बहा ले जाने वाले परम निर्विकार आदिनाथ इस प्रक्रिया में बनने वाली ऊर्जाएँ अत्यंत सूक्ष्म होती हैं ।इसलिए हम उनको प्रत्यक्ष रूप से देख नहीं पाते।इसी कारण शिवलिंग पर चढ़ाया जल अमृत है और यह भी ध्यान दें की गंदगी,भीड़ मेले में चढ़ाया जल अमृत नहीं होता है।
सदाशिव के संपर्क में आया जल अमृत ही हो सकता है।इसके प्रभाव का वर्णन नहीं किया जा सकता है।हमारा शरीर योनि ही है। सभी कुण्डलिनीयों की उत्पत्ति योनिरूपा ही होती है।शीर्ष के योनि यानी सिर का रॉक/ चन्द्रमा, जिसे शिव के शीर्ष और प्रणव के शीर्ष पर दिखाया जाता है। उस पर बिंदु रूपी शिव सहर्ष गिरता रहता है,चंद्र योनि उसे पीती रहती है।
और इसी अमृत का स्वरूप रूप बदलते  हुये सभी योनि में लिंग की भांति सक्रिय रहता है।इसी रति से इकाई का अस्तित्व है।रति बंद होते ही वह नष्ट हो जाता है। इसी कारण देवी अकसर सपाट रखी जाती है। देवीयाँ भौतिक है और सदाशिव अभौतिक इनमें संसारिकता नही है। इनके संसर्ग में फल की इच्छा ही समाप्त हो जाती हैं।
इसलिए प्राचीन काल में मंदिरों को गांव या वादी के बाहर बनाया जाता था और घर में मंदिर का निर्माण अशुभ माना जाता था।यह ऊर्जा वैराग,मानसिक शांति,भौतिकता से अनिच्छा उत्पन्न करती है।यह काम भाव को जला देती है और क्रोधादि को नष्ट कर देती है।
यह स्थिति साधकों के लिए ठीक है, परंतु गृहस्थों के लिए नहीं।आधे 1 घंटे की मानसिक शांति तो ठीक है।लाभ देती है।पर निरंतर इसके प्रभाव में रहने वाला भावुक दयालु वैरागी होगा।पर वह धनहीन,पौरूषहीन और संतान हीन होगा।
अतः शिव की आराधना करने से पहले यह समझ लेना चाहिए कि हमारी कामना क्या है और हम किस स्वरूप की आराधना करें।शिव के अनेक रूप हैं- जैसे सदाशिव, राजराजेश्वर शिव, नटराज शिव, अर्धनारीश्वर शिव, महाकाल शिव, महा बैरागी, महायोगी, काल भैरव,आधारमूल (आधा)।
जो मोक्ष चाहता है उसे सदा शिव की आराधना करनी चाहिए।जो योगमाया को जीतना चाहता है, महायोगी रूप की आराधना करें।ज्ञान और विवेक पूर्ण शक्ति के लिए रौद्र रूप शिव की और राज्य भोग, धन कामना के लिए राज राजेश्वर शिव की, अर्धनारीश्वर की आराधना प्रणय,प्रेम,रति, वशीकरण आदि के लिए और नटराज की आराधना कलात्मक सृजन या विवेकपुर्ण विध्वंस के लिए करें।
महाकाल वह हैं जो इस प्रकृति में उर्जा का प्रवाह स्थापित किए हुए है।काल भैरव वह रूप है जो इस प्रवाह को नियंत्रित और संतुलित रखे हुए हैं।आधा शिवरूप ही है।क्योंकि इसी के आकर्षण से सदाशिव फिर से चांद में समाते हैं।इन तीनों की आराधना समय के प्रभाव से बचने, दीर्घायु, शत्रु जय आदि के लिए करनी चाहिए। साधना विधि अपने संस्कारों के अनुरूप ही चुने।वैसे महाकाल, कालभैरव, आधारमूल तामसी रूप है और इन पर नियंत्रण के लिए पहले स्वयं इन के समान ही उग्र होना पड़ता है।
बिना इन्हें शुद्ध किए उच्चगामी रूप सरलता से सिद्ध नहीं होता। राजराजेश्वर एवं अर्धनारीश्वर एक ही स्वरूप के दो वर्ग रूप है।इनमें भोग की कामना मुख्य है।