सत्य और शाँति

एक दिन
चल पड़ेगें,
चुपचाप, निपट अकेले।

उन एकाकी रास्तों पर ;
जो खुद से खुद तक;
ले जाएँगे ।

वही होंगें ....
महानिर्वाण के रास्ते;
वहीँ होगा तर्पण;

उस क्षण तक फैला,
ये समस्त विस्तार;
अन्यथा है !

जो कुछ भी कहें ,
यात्रा ही सत्य है!
यात्रा ही शाश्वत है!!

घाट से लौटे सारे मर्द,
शव जलाकर ,
तो
परिवार में जमघट लगा था,
आंगन में रखी लालटेन;
बुझते बुझते बुझ रही थी,
रोकर थक चुकी स्त्रियों की आंखे ;
शव के भार को ढोकर थके पुरुषों के कंधे,
एक दूसरे से नजरें चुराते हुए ,
एक दूसरों को देखते हैं ,
और कुछ नही सोचते..
सिवाय इसके कि...
अब रात किसी तरह जल्दी कटे,
यही शाँति है ...
मन की
यही सत्य है !!