हे अधम रक्तरंजिते ! सुजनपूजिते !

राष्ट्रीय नागरिक पंजी, NRC , असम का अंतिम प्रारूप (Draft) 30 जुलाई 2018 को अवलोकनार्थ प्रकाशित किया गया। इसे सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में कुटुंब रेजिस्टर-1951 को अद्यतन, update कर उसका स्वरूप दिया गया। इसके अनुसार तथ्यों के सत्यापन के साथ असम में कुल 2,81,83,677 भारतीय नागरिक सुनिश्चित हुए, वहीं 40,07,707 अवैध मुस्लिम बंगलादेशी घुसपैठिये भी चिन्हित हुए। जो किसी भी प्रकार का वैध-तथ्य, प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाए। जिनका नाम NRC में दर्ज होने से वंचित रह गया।फिर भी उन 40 लाख लोगों को एक मौक़ा और दिया गया। ताकि वे आवश्यक प्रमाण प्रस्तुत कर अपना नाम NRC में जुड़वा सकें।

इस विषय को लेकर आजकल राजनीतिक गलियारों में चिल-पों बड़ी तेज़ी के साथ मचा हुआ है। कोई महा-अशान्ति की कामना करता है। तो कोई हिंसक प्रदर्शन की कामना करता है। यहाँ तक कि वे अवैध घुसपैठिये तथा उनके संरक्षक नेता गृहयुद्ध तक की धमकी दे डाले। विगत कुछ समय से देश के शांति और विकास की स्थिरता पर एक ग्रहण लगता हुआ, अशान्ति व अस्थिरता का माहौल खड़ा किया जा रहा है।

एक वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रवीण कलीता, गुवाहाटी के अनुसार “असम में नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (NRC) का फाइनल ड्राफ्ट जारी होने के बाद से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आग बबूला हो गयीं। हालांकि, खुद बंगाल सरकार एनआरसी की ओर से भेजे दस्तावेजों की जांच-पड़ताल में सबसे पीछे है। एनआरसी स्टेट कोऑर्डिनेटर ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दायर किया है, उसके अनुसार पश्चिम बंगाल को एनआरसी की तरफ से 1.14 लाख दस्तावेज सत्यापन वेरिफिकेशन के लिए भेजे गए थे, जिनमें से सिर्फ 6 फीसदी को ही बंगाल सरकार ने वापस भेजा।

असम में रहनेवाले ऐसे लोगों का यह आंकड़ा था, जो जॉब, रोजी-रोटी या शादी के कारण वहां रह रहे हैं। पहली लिस्ट में 40 लाख लोगों के नाम नहीं होने पर ममता बनर्जी लगातार केंद्र सरकार पर हमलावर रही। ममता का दावा है कि केंद्र सरकार खास तौर पर बंगाल से असम में रहने गए लोगों ( जिनके पास कोई प्रामाणिक दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है) को लिस्ट से निकाल रही है। “

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पश्चिम बंगाल के बाद बिहार, चंडीगढ़, मणिपुर और मेघालय प्रांत हैं जहां से दस्तावेजों की पुष्टि सबसे कम हुई है। इन सभी राज्यों से सिर्फ 2 से 7 फीसदी तक ही नागरिकों का सत्यापन हो सका है। लगभग 5 लाख लोगों का नाम एनआरसी के ड्राफ़्ट में इसलिए शामिल नहीं हो सका है क्योंकि राज्य सरकारों की संस्थाएं दस्तावेजों की जांच कर प्रमाणित करने का काम नहीं कर पाई।

NRC के स्टेट कोऑर्डिनेटर प्रतीक हजेला ने 5.7 लाख दस्तावेज 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जांच-पड़ताल के लिए भेजे थे। NRC, एनआरसी की तरफ से भेजे दस्तावेजों के आधार पर राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को जांच कर यह बताना था कि असम में रहने वाले लोग संबंधित राज्य या संघ शासित प्रदेश के हैं, लेकिन जीवन परिस्थितियों के कारण असम में रह रहे हैं। इन दस्तावेजों में जन्म-प्रमाणपत्र(बर्थ सर्टिफिकेट), चुनाव प्रक्रिया से संबंधित दस्तावेज और असम से पूर्व में रहने वाले राज्य का डोमिसाइल आदि शामिल थे।

सम्भवतः यह मान लेना उचित ही होगा कि दूसरे मौक़े के पश्चात भी 35 लाख से ऊपर अवैध मुस्लिम बंगलादेशियों के नाम नगरिकता की सूची से हटे ही मिलेगें।ये वही अवैध घुसपैठये हैं जो हिंदुस्तान के पिछड़ा, अतिपिछड़ा, SC, ST व अल्पसंखयक तबके के लाखों करोंडों लोगों के रोज़गार हड़पे हुए हैं।उनको संरक्षण देने वाले और उनके पक्ष में खड़े होनेवाले राजनेता हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियों दोनों के दुश्मन हैं।

फिर तो राज्य व केंद्र सरकार निर्णायक रूप से मतदाता सूची एवं सरकारी लाभार्थियों की सूची से उनको हटाने की पहल करे तो ख़ासकर उत्तर भारत के प्रत्येक क्षेत्र, शहर व गाँव में कट्टरपंथी मुल्लाओं का हिंसक प्रदर्शन दिखायी पड़ेगा। एक ऐसा प्रदर्शन जो विखंडित भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ हो।ऐसा भयावह कि सेकूलरवादियों की शांति की अपील भी उन कट्टरवादियों को हिंसा के ताण्डव से रोक नहीं पाएगी। कट्टरपंथ - धर्मांधता अपने सबसे बड़े हथियार यानी जनसंख्या को चुनौती देने पर क़तई शांत नहीं बैठेगा।हिंदुस्तान पहले भी देख चुका है उनकी घिनौनी हरकतों को।रिखने दंगा (Rikhine Roits) को लेकर 11अगस्त 2012 को अमर जवान मेमोरीयल, आज़ाद मैदान, मुंबई को तोड़ते, आगज़नी करते , पूरे देश को एक एक जन को अपमानित करते हुए।

सरकार को इस सम्भावित अकल्पनीय हिंसा से निपटने की कठोर तैयारी करनी पड़ेगी। जिससे कट्टरवाद को चोट मिलेगी वो एक उदाहरण बनेगा।सरकार को सेकूलरवादी और कट्टरपंथी जमात को स्पष्ट संदेश देना होगा कि या तो चुपचाप बिल में घुस जाओ वरना बहुत कुछ जीवन की कठोरतम, अतिकठिन परिस्थितियों को भोगना पड़ सकता है। जीवन से हाथ भी धोना पड़ सकता है। आज की इस सभ्य दुनिया में रहने के लिए तुम योग्य नहीं हो। इन सबके बीच भारी हिंसा होने की सम्भावना है और यदि इस सम्भावित हिंसा से भय खाकर सरकार, न्यायपालिका या व्यवस्थापिका NRC असम पर निर्णायक कार्यवाही से पीछे हटती है तो देश को इसकी क़ीमत सम्भावित गृहयुद्ध से चुकाने पड़ेगी।

छोटी हिंसा का भय अक्सर बड़ी हिंसा को जन्म देता है ...

भारत का विभाजन इसलिए हुआ क्यों कि गाँधी - नेहरु - पटेल और कांग्रेस मुस्लिम लीग के छुरे से होने वाली छोटी सी हिंसा से डरकर घुटने टेक दिये थे। उस समय मुस्लिम लीग से लड़े जाने वाले गृहयुद्ध में हुई हत्यायें, विभाजन से अबतक हुई हिंदुस्तानियों की हत्याओं से कई गुना कम आँकी जाती है। इतिहास ने हमें फिर से एक ऐसे ही मोड़ पर खड़ा कर दिया है जहाँ हमारे नेतृत्व और व्यवस्था को अपनी सुरक्षा व शान्ति के लिए हिंसा और कायरता के बीच एक का चुनाव करना है। आज देश के पास यह अवसर है कि वह 1947 के विभाजन की कायरता के श्राप से भारत, भारत की संतति को मुक्त करे या फिर स्वयं तत्कालीन नेतृत्व जैसा - गाँधी - नेहरु - पटेल बन कर देश को सदा के लिए कांग्रेसी प्रकृति की विरासत बना डाले।

आज इसी उधेड़ बुन में स्वातंत्र वीर सावरकर बहुत ही याद आते हैं। जिनकी बहुत ही स्फूर्तिदायक कालजयी रचना जयोस्तुते ....... बरबस स्वरों में फूट पड़ती है.....

हे अधम रक्तरंजिते ! सुजनपूजिते !

तेरे लिए मरना है जीना

तेरे बिना जीना है मरना

तुम सकल सृष्टि की वंदना ।

“स्मिता- पहचान - स्वतंत्रता” अधम रक्तरंजिता होती है। यही उसकी अनिवार्यता भी है। तभी तो वह सुजनपूजिता सुहृदय वंदिता होती है।